ये आदिल आज़मी के की निजी राय और सवाल हैं !
जनाब असदुद्दीन ओवैसि और अकबरुद्दीन ओवैसि साहब, आप पूरे मुल्क में अपने पैर जमाने के लिए हैदराबाद से निकलकर बाहर आ चुके हैं, आप का कहना है की आप मुल्क में दबे कुचलों की आवाज़ बन कर सबको इंसाफ़ दिलाना चाहते हैं, आप दलित मुस्लिम इत्तेहाद की बात करते हैं, आपका ख़्वाब है हिंदुस्तान के मुसलमानो का हक़ आईन के हिसाब से मुहैया कराना, मैंने आपकी टीवी डिबेट और तकरीरात का मुतालबा किया और बेशक आप जो बोलते हैं वो वज़नदार बातें बोलते हैं, अल्लाह ने आपको बोलने की सलाहियत से नवाज़ा है।
आप ने पिछले एक साल में तीन चुनाव लड़े, बिहार और उत्तरप्रदेश का असेम्ब्ली चुनाव और बिर्हान मुंबई के निगम चुनाव और अब आप दिल्ली में चुनाव लड़ने जा रहे हैं, हर जगह जिस तरह आपने चुनाव लड़ा वो आपके बोली गयी बातों से बिलकुल मेल नहीं खाता। मैं चार बुनयादी मुद्दों पर (जिन पर आप सबसे ज़्यादा ज़ोर देते हैं) आपके कहने और करने में फ़र्क़ आपके सामने पेश कर रहा हूँ:
आख़िर में इतना ही कहना चाहूँगा की अगर आपके पास सेकूलर पार्टियों को कोसने के अलावा मुसलमानो के मुआश्री हालात सुधारने का कोई प्रैक्टिकल ब्लूप्रिंट है तो वो सबके सामने ज़रूर लाए, सिर्फ़ तकरीरो और डिबेट से आप अपने आपको चमका रहे है और पूरी क़ौम को अंधेरे में धकेल रहे हैं।
आदिल आज़मी
जनाब असदुद्दीन ओवैसि और अकबरुद्दीन ओवैसि साहब, आप पूरे मुल्क में अपने पैर जमाने के लिए हैदराबाद से निकलकर बाहर आ चुके हैं, आप का कहना है की आप मुल्क में दबे कुचलों की आवाज़ बन कर सबको इंसाफ़ दिलाना चाहते हैं, आप दलित मुस्लिम इत्तेहाद की बात करते हैं, आपका ख़्वाब है हिंदुस्तान के मुसलमानो का हक़ आईन के हिसाब से मुहैया कराना, मैंने आपकी टीवी डिबेट और तकरीरात का मुतालबा किया और बेशक आप जो बोलते हैं वो वज़नदार बातें बोलते हैं, अल्लाह ने आपको बोलने की सलाहियत से नवाज़ा है।
आप ने पिछले एक साल में तीन चुनाव लड़े, बिहार और उत्तरप्रदेश का असेम्ब्ली चुनाव और बिर्हान मुंबई के निगम चुनाव और अब आप दिल्ली में चुनाव लड़ने जा रहे हैं, हर जगह जिस तरह आपने चुनाव लड़ा वो आपके बोली गयी बातों से बिलकुल मेल नहीं खाता। मैं चार बुनयादी मुद्दों पर (जिन पर आप सबसे ज़्यादा ज़ोर देते हैं) आपके कहने और करने में फ़र्क़ आपके सामने पेश कर रहा हूँ:
1.*दलित मुस्लिम इत्तेहाद*
आपने बड़ी तकरीरत करी हैं इस मुद्दे पर, लेकिन आज तक आपके पास एक भी ज़िम्मेदार दलित चेहरा नहीं है, ये कहना ग़लत है की आपसे दलित जुड़ना नहीं चाहते, ख़ास कर के यूपी और दिल्ली को मैंने नज़दीक से देखा है, कई छोटे बड़े दलित चेहरे आपसे एक अदद मुलाक़ात को तरसते रह गए पर आपने उन्हें वक़्त देना मुनासिब नहीं समझा, दिल्ली में भगवान दास जाटव जैसे बड़े नाम आपके घर के चक्कर काट काट कर थक गए लेकिन आपके पास वक़्त ना हुआ, बामसेफ का एक बहुत बड़ा तबक़ा आपसे यूपी में जुड़ना चाहता था पर आपने उन्हें सुन्ना भी ज़रूरी नहीं समझा। आजतक एक भी बड़ा प्रोग्राम आपने दलितों को जोड़ने के लिए नहीं किया, कभी भी आपने अपनी तरफ़ से कोई मज़बूत पहल नहीं की, यूपी में ख़बर थी की आप मायावती से जुड़ना चाहते थे, पर ये फ़ैसला सियासी ज़्यादा और बुनयादी कम था।2.*सियासी ख़ुदमुख़्तारी*:
आप पूरे हिंदुस्तान में मुसलमानो की सियासी ख़ुदमुख़्तारी की बात करते हैं, पर आप जिस तरह से टिकट बाँटते हैं उससे सियासी ख़ुदमुख़्तारी तो दूर की बात है। आपने आजतक ये भी बताना मुनासिब नहीं समझा की आप किसी को टिकट किस बिनाह पर देते हैं, मैं ओपन चैलंज करता हूँ की अगर आपका कैंडिडेट सिलेक्शन प्रॉसेस कहीं लिखित में हैं तो वो सामने लाए। मुंबई, यूपी और अब दिल्ली से साफ़ है की आपको हैदराबाद के ग़ुलाम चाइए ना की वो जो सियासी ख़ुदमुख़्तारी के क़ाबिल हों।3. *लोकतांत्रिक व्यवस्था*
TV डिबेट में आप समविधान और लोकतंत्र का हवाला देते थकते नहीं हैं, पर माफ़ कीजिएगा आपके संगठन में लोकतंत्र दूर दूर तक नहीं है, हर जगह आपके लोग हैदराबाद लिंक से चलते हैं और संगठन की हालत ये है की हर कोई अपने आपको ख़लीफ़ा समझता है क्यूँकि उसके हैदराबाद में ऊपर लेवल पर बात है। पिछले दिनो हैदराबाद से दो क़ाबिल लोग दिल्ली में तशरीफ़ फ़रमा थे, उन्मे से एक से मैंने लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांत, “डीसेंट्रलाईजेशन आफ पॉवर्ज़” के बारे में पूछा और ये जान्ना चाहा कि AIMIM में इसकी क्या नज़्म है, उनका जवाब सुनकर मुझे बेहद हँसी आई, उनके मुताबिक़ सूबाई सदर बनाना डीसेंट्रलाईजेशन आफ पॉवर्ज़ कहलाता है। दिल्ली में एक मज़बूत संगठन होने के बावजूद भी उसे दरकीनार किया जाना कुछ अजीब सा लगता है।4.*चुनावी रणनीति*
आप जहाँ भी चुनाव लड़ते हैं वहाँ आजतक आपने अपना कोई भी मैनिफ़ेस्टो रिलीज़ नहीं किया, आप की तकरीरात में शिकायतें ज़्यादा और मसाएल का हल कम होता है, आप वोट माँगते वक़्त मुस्लिम क़यादत पर ज़ोर देते हैं पर वो आएगी कैसे ये आप कभी नहीं बताते, मुस्लिम तालीम से लेकर रोज़गार तक आपका क्या रोड्मैप है, किसी को पता नहीं, ज़्यादा पूछे जाने पर आप दारुस्सलाम का हवाला देते हैं, पर बाक़ी जगह आप इसको कैसे रेपलिकेट करेंगे उसकी नज़्म का कही अता पता नहीं होता। दारुस्सलाम को खड़ा करने में आपसे ज़्यादा आपके दादा और आपके अब्बा का योगदान है, आप दोनो भाइयों ने दारुस्सलाम के अलावा आज तक क्या किया ये देखना अभी बाक़ी है। आप मुस्लिम जज़्बात के नाम पर वोट माँग कर मुसलमानो के हालात को और ख़राब कर रहे है।आख़िर में इतना ही कहना चाहूँगा की अगर आपके पास सेकूलर पार्टियों को कोसने के अलावा मुसलमानो के मुआश्री हालात सुधारने का कोई प्रैक्टिकल ब्लूप्रिंट है तो वो सबके सामने ज़रूर लाए, सिर्फ़ तकरीरो और डिबेट से आप अपने आपको चमका रहे है और पूरी क़ौम को अंधेरे में धकेल रहे हैं।
आदिल आज़मी

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