फेसबुक मित्र माहरुख जफ़र लिखती हैं-
गोमांस सेवन पर एक दूसरा पझ भी है जिसे जानने और समझने की आवश्यकता है। भारतीय मुसलमानों ने कभी भी गोमांस को प्राथमिकता नहीं दी। बाबर ने अपनी वसीयत ‘तुजुक-ए -बाबरी’ में अपने बेटे हुमायूं को ताक़ीद की थी कि वह हिन्दुओं की भावनाओं का ख्याल रखे और इस बात के लिये भरसक प्रयास करे कि मुग़ल सल्तनत में गाय की हत्या या क़ुर्बानी न हो। दूसरे मुग़ल बादशाहों -अकबर,जहांगीर और अहमद शाह ने गोहत्या पर प्रतिबंध क़ायम रखा। हैदर अली और टीपू सुल्तान ने अपनी रियासत में गो-हत्या और गोमांस के सेवन को अपराध की श्रेणी में रखा और कानून तोड़ने वालो के लिए हाथ काट देने की सज़ा का प्रावधान किया। आज भारत में छत्तीस हज़ार से ज्यादा बूचड़खाने हैं। क्या यह मुसलमानो की देन है ?’
आज़ाद भारत में देश में दिन-ब-दिन बढ़ रहे बूचड़खानों और गोमांस के सेवन के
लिए क्या आप सिर्फ मुसलमानों को ज़िम्मेदार ठहराएंगे ? देश के ज्यादातर
लोगों की तरह मेरा भी मानना है कि देश के बहुसंख्यक हिंदुओं की भावनाओं का
आदर करते हुए कुछ प्रदेशों में नहीं, पूरे देश में एक साथ गोमांस के सेवन
पर प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए। और हां, गोमांस का सेवन अगर अपराध है तो
देशवासियों द्वारा विदेशियों को गोमांस परोसना भी अपराध है। आज भारत में
हज़ारों वैध-अवैध बूचड़खानों में गाएं काटी जाती हैं और उन्हें विदेशों में
निर्यात किया जाता है। जिस देश में गाय हज़ारों साल से बहुसंख्यक लोगों के
लिए आस्था और भावना का सवाल रही है, उसे आज विश्व में गोमांस के सबसे बड़े
निर्यातक का दर्ज़ा हासिल है। बूचड़खानों के मालिकों और गोमांस के निर्यातकों
में मुसलमानों से ज्यादा बड़ी संख्या हिंदुओं की है। क्या इस बात पर किसी
को शर्म भी आती है ? गाय अगर माता है तो उसका वैध या अवैध क़त्ल और आमदनी के
लिए विदेशियों के साथ उसके मांस का सौदा अमानवीयता की पराकाष्ठा है। तो
लोगों की धार्मिक आस्थाओं के सियासी इस्तेमाल और पाखंड पर विराम लगाईए !
हिम्मत है तो एक साथ पूरे देश के बूचड़खानों को बंद और गोमांस के सेवन और
निर्यात को कानूनन अपराध घोषित करिए ! बूचड़खानों में काम कर रहे लाखों
लोगों को अगर सरकार रोज़गार या रोज़गार के लिए सस्ते दर पर क़र्ज़ उपलब्ध करा
सके यक़ीन मानिए, कोई मुसलमान इसका विरोध नहीं करेगा !

No comments:
Post a Comment