लिप्त !
By:- Imran Khan MiM News , Delhi
यूपी के राजनीतिक दलों , राजनीतिक बाहुबलियों और राजनीतिक हस्तियों का भविष्य अब मतदाताओं के हाथ में है | यूपी की कमान किसके हाथ लगेगी और किसके हाथ में नही लगेगी ये तो 11 मार्च को सामने आ ही जाएगा | जिस तरीके से विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा हो जाने के बाद सत्ताधारी दल समाजवादी पार्टी अपने घर के झगड़ो मे ही उलझी रही उससे मौजूदा राजनीतिक परिदृश्यक में इस दल की छवि जरुर चोटिल हुई है और समाजवादी पार्टी को इससे नुकसान हो सकता है इसमें भी दोहराय नही है | दूसरी ओर बसपा फिर से सत्ता पाने की पूरी करती दिखाई दे रही है |इस चुनाव में मायावती की रैलियों में वैसी ही टूट पड़ती भीड़ फिर दिखी है | अब यह अलग बात है कि मीडिया में वह कुछ कमज़ोर दिखाई दीं | अगर बीजेपी को देखा जाए तो यूपी विधानसभा चुनाव 2012 की स्थिति को सुधारने के लिए “प्रदेश बीजेपी” से ज्यादा “राष्ट्रीय बीजेपी” दिखाई दीं पूरे चुनाव में | जहां बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री मोदी ने प्रदेश में खुद को ही दांव पर लगा दिया | अगर सही मायनों में देखा जाए तो यूपी विधानसभी चुनाव में सबसे सुरक्षित खेल काग्रेंस ने ही खेला है | काग्रेंस ने सपा के साथ गठबंधन करके ये भी संकेत दे दिए कि वो देश के सबसे बड़े राज्य में किसी पार्टी के बगैर खड़ी नही हो सकती है | बिहार ही तर्ज पर ही यूपी में एक बड़े दल के साथ गठबंधन करके काग्रेंस फिर से उठ खड़ी होने के लिए तैयार दिखाई देती है | वही आरएलडी यानी राष्ट्रीय लोकदल पश्चिम यूपी में मजबूत मानी जाती हो और पहली बार यूपी में चुनाव लड़ रही AIMIM पार्टी अगर ये छोटे दल यूपी चुनाव में कुछ करिश्मा कर जाते है और खुदा न खास्ता, किन्हीं दो बड़े दलों में कांटे की टक्कर हो गई और किसी को बहुमत के लिए पन्द्रह-बीस सीटों की कमी पड़ गई, तो अजित सिंह और असद् औवेसी के घरों के बाहर मेला भी लग सकता है | हा जरुर ये 11 मार्च के बाद पता लगेगा कि किसके घर के बाहर मेला लगेगा और किसके नही |
.करीब दो महिने से इलेक्शन के चलते नेताओ को जरुर थका दिया होगा , सबसे ज्यादा परेशानी पहले चरण और आखिरी चरण के प्रत्यशी को ही हुई होगी | जहा पहले चरण वाले प्रत्याशी की ये शिकायत रहती होगी की उसको प्रचार में कम समय मिला है तो वही दूसरी ओर आखिरी चरण के प्रत्याशी की ये शिकायत रहती होगी की उसको पैसा ज्यादा खर्च करना पड़ा और मेहनत भी काफी करनी पड़ी |
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2012 में जब विधानसभा चुनाव हुए थे तो समाजवादी पार्टी को 29.13 फीसदी और बसपा को 25.91 फीसदी मत मिले थे | उसके पीछे जायें तो 2007 विधानसभा चुनाव में बसपा को 29.5, समाजवादी पार्टी को 25.5 फीसदी मत मिले थे | बीजेपी को इन दोंनों चुनावों में 17 फीसदी के आसपास मत मिले थे |
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